08-Dec-2019

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सात फीसदी रही मध्‍यप्रदेश में विकास दर, प्रति व्यक्ति आय 90 हजार पार

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भोपाल। विधानसभा में प्रस्तुत हुए 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक प्रदेश में विकास की गति सात फीसदी की दर से आगे बढ़ रही है। यह वर्ष 2017-18 के 6.19 फीसदी के मुकाबले अधिक है। वहीं, प्रति व्यक्ति सालाना आय स्थिर भाव पर 82 हजार 941 रुपए से 9.71 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 90 हजार 998 रुपए पहुंच गई है।

हालांकि, सकल घरेलू उत्पाद में उद्योगों का योगदान 27.09 प्रतिशत से घटकर 24.14 प्रतिशत पहुंच गया है। अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के सूचकांक में प्रदेश का स्थान 25वां रहा है। खेती का रकबा 1.66 लाख हेक्टेयर घटा है तो कृषि क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 37.40 प्रतिशत से घटकर 37.17 प्रतिशत हो गया है। प्रचलित भाव पर देखा जाए तो यह 39.06 प्रतिशत से 35.94 आंका गया है। कुपोषण आज भी प्रदेश के लिए चुनौती बना हुआ है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर प्रति हजार में 77 है जो असम को छोड़कर अन्य राज्यों से अधिक है।

विधानसभा में प्रस्तुत हुए 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण से प्रदेश की यह तस्वीर सामने आई है। सर्वेक्षण के मुताबिक प्रदेश में 2016-17 में प्राथमिक शालाओं में कुल नामांकन 78 लाख 92 हजार था जो 2017-18 में घटकर 77.30 रह गया।

माध्यमिक शालाओं में भी नामांकन 44.61 लाख से घटकर 43.63 लाख रह गया। कृषि गणना के मुताबिक 2011 से 15 के बीच किसानों की संख्या में 11.31 लाख की बढ़ोतरी हुई। जबकि, इसी अवधि में रकबा 1.66 लाख हेक्टेयर कम हुआ है। कृषि फसलों के लागत मूल्य को हटाने के बाद 2017-18 में सालाना वृद्धि दर 0.1 प्रतिशत रही, जो राष्ट्रीय स्तर पर 3.8 है।

सर्वेक्षण में इस बात पर चिंता जाहिर की गई कि कृषि क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की प्रति व्यक्ति कृषि से आय बहुत कम है। 2016-17 के मुकाबले 2017-18 में 1.88 प्रतिशत की कमी खाद्यान्न् उत्पादन में कम रहा। मानसून पर निर्भरता, छोटी जोत के कारण लागत बढ़ना भी चिंता का सबब है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रमुख सूचकांक की स्थिति संतोषजनक नहीं है। प्रति हजार जीवित जन्म पर शिशु मृत्यु दर 47 है तो देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी अधिक है।

मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख प्रसव पर 173 है जो कि राष्ट्रीय स्तर पर 130 है। 52.4 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी से पीड़ित हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, डॉक्टरों और नर्सों की बड़ी कमी है। डेढ़ लाख स्कूलों में से 71 प्रतिशत में बिजली नहीं है। 19 हजार स्कूल में एक शिक्षक है तो साढ़े चार हजार स्कूल सिर्फ एक कमरे के भवन में चल रहे हैं। भुखमरी के सूचकांक में मध्यप्रदेश सिर्फ बिहार और झारखंड से बेहतर स्थिति में है।

गरीबी के स्तर में मध्यप्रदेश 27वें स्थान पर

मध्यप्रदेश आज भी देश में गरीबी के स्तर के मामले में 27वें स्थान पर है। देश में 21.92 प्रतिशत की तुलना में मप्र में 31.65 फीसदी जनसंख्या (हेड काउंट रेशो) गरीबी रेखा के नीचे है। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद प्रदेश में गरीबी उन्मूलन एक प्रमुख चुनौती दिखाई देती है।

गुणवत्ता शिक्षा के मामले में भी पिछड़ा प्रदेश

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2015-16 में मध्यप्रदेश में प्रायमरी शिक्षा के स्तर पर शुद्ध नामांकन अनुपात में 78.9 प्रतिशत है जो देश के अनुपात से करीब साढ़े सात फीसदी कम है। देश में प्राइमरी शिक्षा का शुद्ध नामांकन 87.3 प्रतिशत है।

नीति आयोग द्वारा जारी सतत विकास लक्ष्यों के तुलनात्मक विश्लेषण के अनुसार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के सूचकांक में मप्र देश के 29 राज्यों में 23वें स्थान पर है। पहली से पाचवीं तक की कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के स्कूल छोड़ने का प्रतिशत 2017-18 में छात्र का 4.6 व छात्राओं का 3.6 रहा तो छठवीं से आठवीं में 4.7 व 4.6 रहा। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2002 के मुताबिक अच्छा स्वास्थ्य एवं खुशहाली के सूचकांक में देश में मध्यप्रदेश 25वीं पायदान पर है।

किसानों को प्रमाणित बीज देने में पिछड़े

आर्थिक सर्वेक्षण में सामने आया है कि मध्यप्रदेश किसानों को प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने में पिछड़ गया है। जहां 2017-18 में किसानों को 39.75 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज दिए गए थे, वहीं 2018-19 में दिसंबर 18 तक मात्र 21.03 प्रमाणित बीज ही किसानों को दिए जा सके।

सिंचाई भू-जल पर ही निर्भर

प्रदेश में सिंचित क्षेत्र सामान्य वृद्धि दर्ज की जा रही है। यह सामने आया है कि सिंचाई के लिए भूजल दोहन पर निर्भरता बढ़ रही है। प्रदेश में सिंचाई जलाशयों के माध्यम से जल संग्रहण क्षमता विकसित करने की अभी भी जरूरत है।

साभार- नईदुनिया

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